
एमपीपोस्ट, भोपाल, 26 अप्रैल 2026 । मध्यप्रदेश की 16वीं विधानसभा में 27 महिला विधायकों की मौजूदगी केवल चुनावी जीत का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उन 27 संघर्षों की कहानी है जिन्होंने ‘घर की दहलीज’ और ‘सदन की कुर्सी’ के बीच के फासले को अपनी जीवटता से मिटाया है।
इस बार के सदन में महिला शक्ति का एक ऐसा गुलदस्ता सजा है, जिसमें दिहाड़ी मजदूर से लेकर पूर्व राजघरानों की परंपराएं और युवा जोश से लेकर अनुभवी विजन तक सब कुछ शामिल है। चूल्हे की आंच से सदन की दहलीज तक: मध्यप्रदेश की राजनीति में ‘ममत्व’ और ‘मजबूती’ का नया दौर देखने को मिल रहा है।
मौजूदा विधानसभा में इस बार जो 27 ‘माननीय’ महिलाएं बैठी हैं, उनके पास केवल नीतियां बनाने का अधिकार नहीं है, बल्कि उनके पास उन लाखों महिलाओं की उम्मीदें हैं जो आज भी राजनीति को दूर का सपना मानती हैं। इस बार की ‘नारी शक्ति’ में संवेदनशीलता और कड़े प्रशासनिक फैसलों का एक अनूठा संगम देखने को मिल रहा है।
सदन में जब संपतिया उइके (भाजपा) खड़ी होती हैं, तो वह केवल एक कैबिनेट मंत्री नहीं, बल्कि उस अदम्य साहस का प्रतीक होती हैं जिसने कभी दिहाड़ी मजदूरी कर अपना जीवन बिताया था। एक मजदूर से लेकर राज्य सभा सदस्य और अब कैबिनेट मंत्री तक का उनका सफर यह बताता है कि संघर्ष की मिट्टी से उपजा नेतृत्व कितना मजबूत होता है।
कृष्णा गौर की भोपाल की गोविंदपुरा सीट से 1.06 लाख वोटों की ऐतिहासिक जीत दर्ज
प्रियंका पैंची 31 साल की प्रियंका पैंची (भाजपा) इस विधानसभा का सबसे युवा चेहरा हैं। उन्होंने चाचौड़ा में 5 बार के सांसद और दिग्गज नेता लक्ष्मण सिंह को हराकर यह बड़ा संदेश दिया है।
जहाँ निर्मला भूरिया 5 बार की जीत के साथ सदन में आदिवासी हितों की बात कर रही हैं, वहीं अनुभा मुंजारे ने बालाघाट में एक कद्दावर मंत्री को हराया है
‘आधी आबादी’ का नेतृत्व: कुल महिला विधायक: 27 (21 भाजपा, 6 कांग्रेस)
महिला विधायकों में सुश्री मीना सिंह मांडवे (मानपुर) सबसे वरिष्ठ हैं, जो 6वीं बार सदन की सदस्य बनी हैं। उनके बाद कुमारी निर्मला भूरिया (पेटलावद) का स्थान है, जो 5वीं बार निर्वाचित हुई हैं। उधर श्रीमती सुमित्रा, कविता पाटीदार और श्रीमती माया विक्रमसिंह नारोलिया राज्य सभा की शोभा बढ़ा रहीं हैं। श्रीमती सावित्री ठाकुर,राज्य मंत्री महिला एवं बाल विकास मंत्रालय भारत सरकार में महिलाओं के हितों की रक्षा मुस्तैदी से कर रहीं हैं वहीँ श्रीमती लता बानखेड़े, हिमांद्री सिंह, और श्रीमती संध्या राय लोकसभा में महिलाओं और मध्यप्रदेश की आवाज़ बनकर खड़ी हैं।
यह पहली बार है जब प्रदेश की प्रशासनिक बागडोर में भी महिलाओं का कद बढ़ा है। जहाँ 17 जिलों की कमान महिला कलेक्टर संभाल रही हैं, वहीं सदन में ये 27 महिलायें एक ऐसी दीवार की तरह खड़ी हैं जो केवल राजनीति नहीं करतीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट के साथ जनसेवा को प्राथमिकता देती हैं।
मध्यप्रदेश विधानसभा का यह स्वरूप बताता है कि अब राजनीति और प्रशासन केवल पुरुषों का मैदान नहीं रही, यहाँ अब ‘बेटी, बहन और माँ’ के नजरिए से प्रदेश के भविष्य की इबारत लिखी जा रही है। वहीँ 17 कलेक्टर और एक कमिश्नर के पद पर तैनात हैं।
आधी आबादी का पूरा शासन: मध्यप्रदेश में पहली बार 17 ‘लेडी कलेक्टर्स’ के पास जिलों की कमान
मध्यप्रदेश के विभिन्न 17 जिलों में तैनात महिला कलेक्टर हैं -खरगोन, सुश्री भव्या मित्तल, बडवानी,श्रीमती जयति सिंह, आलीराजपुर, श्रीमती नीतू माथुर, रतलाम, सुश्री मिशा सिंह, शाजापुर, सुश्री ऋजु बाफना, आगर मालवा, श्रीमती प्रीति यादव, मंदसौर, सुश्री अदिति गर्ग, ग्वालियर, श्रीमती रूचिका चौहान, श्योपुर, सुश्री शीला दाहिमा, मैहर,श्रीमती बिदिशा मुखर्जी, उमरिया,श्रीमती राखी सहाय, सागर, श्रीमती प्रतिभा पाल, पन्ना, श्रीमती ऊषा परमार, निवाड़ी,श्रीमती जमुना भिडे, नरसिंहपुर, श्रीमती रजनी सिंह, सिवनी,श्रीमती नेहा मीना, डिण्डोरी ,श्रीमती अंजू पवन भदौरिया।श्रीमती सुरभि गुप्ता भी हैं, जो शहडोल की कमिश्नर हैं।
मध्यप्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है, जहाँ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल के दौरान नारी शक्ति को अभूतपूर्व बढ़ावा मिला है। प्रदेश के इतिहास में यह पहली बार है जब 17 जिलों की कमान महिला कलेक्टरों के हाथों में सौंपी गई है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का मानना है कि महिलाएँ किसी भी कार्य को अधिक जिम्मेदारी, पारदर्शिता और तीव्र गति से पूरा करती हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपनी प्रशासनिक व्यवस्था में रानी दुर्गावती और देवी अहिल्याबाई होल्कर के शासनकाल को रोल मॉडल के रूप में देख रहे हैं। यही कारण है कि सत्ता के साथ-साथ प्रशासनिक क्षेत्र में भी महिलाओं का कद बढ़ा है। सरकार में जहाँ 5 महिला मंत्री (संपतिया उइके, निर्मला भूरिया, कृष्णा गौर, प्रतिमा बागरी और राधा सिंह) नीतिगत निर्णय ले रही हैं, वहीं ये महिला कलेक्टर जमीनी स्तर पर शासन को मजबूत कर रही हैं।
यह बदलाव मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासन में महिलाओं की केवल भागीदारी नहीं, बल्कि उनके निर्णायक नेतृत्व की पहचान बन रहा है।