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SIHAVA-भारत के सबसे पुराने दो आंदोलनों में से एक रहा नगरी- सिहावा का आन्दोलन

सुप्रसिद्ध समाजवादी राजनेता रघु ठाकुर की अगुवाई में 1977 से चलता रहा यह आंदोलन

 

नक्सलवाद से घिरे क्षेत्र में अहिंसा का टापू है नगरी – सिहावा

 

 

तेहत्तर साल बीत गये, पांच पीढ़ियां खप गयीं, तब जाकर छत्तीसगढ़ में नगरी- सिहावा के आंदोलन का एक चक्र पूरा हुआ।‌ दुष्यंत कुमार की पंक्तियां याद आती हैं –
‘ पिछले सफर की न पूछो , टूटा हुआ एक रथ है / जो रुक गया था कहीं पर फिर साथ चलने लगा है। ‘
नक्सलवाद के लाल गलियारे के बीच नगरी सिहावा अहिंसा का एक टापू है।‌ 1952 से अब तक यहां के आदिवासियों ने पीढ़ी दर पीढ़ी अपने भूमि अधिकारों के लिए निरंतर अहिंसक संघर्ष किया। जब नया छत्तीसगढ़ राज्य बन रहा था तब लम्बे समय तक भूखे प्यासे रहकर हजारों आदिवासी ने राजधानी रायपुर में डेरा डाले थे और देश की आजादी के बाद से चल रहे इस आंदोलन को गति दे रहे थे।

डॉ राममनोहर लोहिया सन् १९५२ में छत्तीसगढ़ अंचल में धमतरी जिले के उमरादेहान गांव में आये थे।‌ यहीं से उन्होंने जंगलों में बसे आदिवासियों के भूमि – अधिकार का मुद्दा उठाया था।

आज भारत में आदिवासियों को आजीविका के लिए जमीन मिली है, वनग्रामों को राजस्व ग्राम जैसी सुविधाएं मिल रही हैं। इन सबके मूल में नगरी सिहावा का ही आन्दोलन है।

इसी उमरादेहान गांव में आगामी 24 मई को डॉ राममनोहर लोहिया की आवक्ष प्रतिमा का अनावरण होने जा रहा है। आदिवासियों ने एक एक मुठ्ठी अनाज हर घर से लेकर प्रतिमा तैयार कराई है।

लोहिया जी जब तक रहे , यानी १९६७ तक , इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। १९७७ के बाद इसकी बागडोर देश के सुप्रसिद्ध समाजवादी नेता रघु ठाकुर ने सम्हाली। उनका समूचा जीवन संघर्ष और आंदोलनों में बीता। आपातकाल में उन्नीस महीने जेल में रहे।

अनेक संघर्षों के बाद सन् १९९० आते आते नगरी सिहावा के अठारह में से तेरह गांवों के आदिवासियों को जमीन का पट्टा मिल गया, पर पांच गांव फिर भी छूट गये।‌ इससे पांच साल पहले प्रधानमंत्री राजीव गांधी यहां दुगली में आये थे , आदिवासियों की झोपड़ी के सामने चारपाई पर बैठे थे पर आदिवासियों को उनके हक बिना पदयात्रा, प्रदर्शन व अनशन के नहीं मिले। रघु ठाकुर ने जाकर आदिवासियों के इस आन्दोलन को तेज किया। उसी दुगली से रायपुर तक १२० किमी की पदयात्रा की जिसमें हजारों आदिवासी आदमी – औरतें और बच्चे पैदल चले थे। इन आन्दोलनों में पत्रकार मधुकर खेर , गोविन्दलाल वोरा, सत्यनारायण शर्मा, नारवानी जी व रमेश वल्यानी का बड़ा सहयोग मिला। सरकार के मंत्रियों ने आकर आश्वासन देकर आन्दोलन स्थगित कराया, पर वादा पूरा नहीं किया। रघु जी को फिर रायपुर आकर अम्बेडकर चौक पर अनशन शुरू करना पड़ा। सांसद जार्ज फर्नांडीज और शरद यादव ने आकर गिरफ्तारियां दीं, मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा ने हस्तक्षेप किया, तब जाकर दोनों पक्ष में समझौते के कागज तैयार हुए। इसके तहत तय हुआ कि अठारह गांवों के कब्जे की जमीन की जांच कराई जाएगी और निर्धारित नियम के तहत पट्टे दिए जायेंगे, जिन पांच गांवों को उजाड़ा गया है उन गांवों के लोगों की भी झोपड़ियों को दुरुस्त कराकर बसाया जायेगा, जमीन दी जायेगी। तेरह गांवों को तो पट्टा मिल गया, लेकिन यही पांच गांव को पट्टा मिलने में पच्चीस साल और लग गये।
इस आन्दोलन का इतिहास जब भी देश की जनता के सामने आयेगा सुखराम नागे, जुगलाल नागे, बिसाहूलाल साहू , रामू , बिसाहिन बाई, समरीनबाई, रामप्रसाद नेताम, गौड़ा राय , वंशी श्रीमाली, जालिम सिंह जैसे अनेक लोगों का संघर्ष सभी को प्रेरणा देगा।
इस आन्दोलन के संदर्भ में यह बताना भी जरूरी है कि कुछ लोग सत्ता में रहते हुए भी समय पर कुछ नहीं कर पाये, कुछ ने समय का लाभ उठाकर अपने वैचारिक समर्थकों को उपकृत किया तो कुछ आदिवासियों को समाजवादी धारा से हटाकर अपने – अपनी राजनीतिक जमीन पुख्ता करने का प्रयास किया।
नगरी सिहावा का तेहत्तर साल चला आन्दोलन अभी थमा नहीं है। यह चिकित्सा और शिक्षा के मूल अधिकार की लड़ाई को आगे ले जायेगा।
इस आन्दोलन का कई कारणों से ऐतिहासिक महत्व है। नक्सली हिंसा से घिरे वनांचल में यह अहिंसा का टापू है। भारत का पहला वनग्राम सम्मेलन यहीं से शुरू हुआ। और , वन अधिकार कानून का जन्मदाता यही क्षेत्र है। यहां की महिलाओं की मुक्त भावना और संघर्ष के जज्बे से शेष भारत प्रेरणा ले सकता है।

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