
(सुनीता नगेले , चीफ एडिटर , एमपीपोस्ट)
भारतीय लोकतंत्र के 75 वर्षों के सफर में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि वे इतिहास के पन्नों पर स्थायी छाप छोड़ जाती हैं। 21 सितंबर 2023 ऐसी ही एक तारीख थी, जब संसद के दोनों सदनों-लोकसभा और राज्यसभा-ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पारित कर महिलाओं की दशकों पुरानी आकांक्षाओं को विधायी स्वरूप दिया। अब 16 अप्रैल 2026 उसी यात्रा का अगला निर्णायक पड़ाव बनकर सामने है, जब यह कानून सैद्धांतिक स्वीकृति से आगे बढ़कर व्यावहारिक कार्यान्वयन की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
“नारी शक्ति वंदन अधिनियम, लोकतंत्र में महिलाओं की नई भूमिका, संसद की दहलीज से हकीकत के आंगन तक, संसद की सीढ़ियों से समाज की चौखट तक, सिर्फ कानून नहीं, सदियों की प्रतीक्षा का उत्तर” 27 साल का संघर्ष और एक नई सुबह का इंतज़ार”
भारतीय लोकतंत्र के 75 वर्षों के सफर में 21 सितंबर 2023 की रात सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक ‘ऐतिहासिक सुधार’ की गवाह बनी। जब भारत के संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर अपनी मुहर लगाई, तो वह केवल एक कानून का पारित होना नहीं था; वह उन करोड़ों महिलाओं की आकांक्षाओं का सम्मान था जो दशकों से नीति-निर्धारण की मेजों पर अपनी जगह मांग रही थीं।
जहां तक बात वर्तमान सरकार और भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की मंशा की है तो वे “नारी शक्ति वंदन अधिनियम”, लोकतंत्र में महिलाओं के आरक्षण के लिए भागीरथी प्रयास कर रहे हैं। “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” का श्री नरेंद्र मोदी के इंडिया के प्राइम मिनिस्टर रहते हुए क्रियान्वयन हो गया तो वे भारतीय राजनीति की इस सदी के ऐसे राजनेता के रूप में स्थापित होंगे जिनको, देश की आदी आबादी के साथ ही भारत का प्रत्येक नागरिक कभी भी उनके महिलाओं के कल्याण की दिशा में किये जा रहे काम को भुला नहीं सकेगा।
तथ्यों के आइने में: बेमिसाल और ऐतिहासिक:
In our country, the Panchayati Raj institutions are a remarkable example of women's leadership. pic.twitter.com/7uNzwK3ySl
— PMO India (@PMOIndia) April 13, 2026
वैसे फिलवक्त इस कानून की यात्रा और इसकी विशिष्टता को समझने के लिए कुछ अहम तथ्यों पर गौर करना न केवल बेहद जरूरी है बल्कि समीचीन भी है।
संसदीय यात्रा: इसे 19 सितंबर 2023 को लोकसभा में 128वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया गया। 20 सितंबर को लोकसभा ने इसे (454 बनाम 2) और 21 सितंबर को राज्यसभा ने इसे सर्वसम्मति (214 बनाम 0) से पारित किया।
संवैधानिक पहचान: राष्ट्रपति की सहमति के बाद यह 106वां संविधान संशोधन अधिनियम बना।
आरक्षण का स्वरूप: यह अधिनियम लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करता है।
कोटा में कोटा: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में भी एक-तिहाई हिस्सा महिलाओं के लिए सुनिश्चित किया गया है।
बतौर एक जर्नलिस्ट जब मैं संसद की उन खाली दीर्घाओं की कल्पना करती हूँ जहाँ कभी महिलाओं की मौजूदगी उंगलियों पर गिनी जा सकती थी, तो यह बदलाव सुखद लगता है। लेकिन सवाल केवल 33% संख्या का नहीं है, सवाल ‘दृष्टिकोण’ का है।
जब संसद में महिलाएं बढ़ेंगी, तो स्वास्थ्य, शिक्षा, मातृत्व और सुरक्षा जैसे विषयों पर चर्चा ‘सहानुभूति’ से नहीं, बल्कि ‘अनुभव’ से होगी। यह कानून उन पितृ सत्तात्मक बेड़ियों को तोड़ने की दिशा में बड़ा प्रहार है, जहाँ राजनीति को ‘पुरुषों का खेल’ माना जाता था।
“यह अधिनियम उस चुप्पी को तोड़ने का माध्यम बनेगा जो नीतिगत फैसलों में महिलाओं की गैर-मौजूदगी के कारण बनी हुई थी।”
चुनौतियां और राह: भविष्य की ओर: हालांकि, इस जीत के साथ कुछ तकनीकी पेंच भी जुड़े हैं जिन्हें स्पष्टता से समझना होगा
परिसीमन का इंतजार: यह आरक्षण अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) के बाद ही प्रभावी होगा। यानी 2029 तक लागू होने की संभावना है।
15 साल की समय सीमा: फिलहाल यह व्यवस्था 15 वर्षों के लिए की गई है, जिसे भविष्य में संसद बढ़ा सकती है।
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ केवल एक विधायी जीत नहीं है, बल्कि यह देश की आधी आबादी को ‘पॉवर स्ट्रक्चर’ में बराबर का साझीदार बनाने का वादा है। एक महिला पत्रकार के रूप में, मैं इसे उस सफर की शुरुआत मानती हूँ जहाँ संसद की सीढ़ियाँ चढ़ने वाली हर महिला अपने साथ उन करोड़ों आवाजों को ले जाएगी जो अब तक अनसुनी थीं।
“सिर्फ कानून नहीं, सदियों की प्रतीक्षा का उत्तर”
21 सितंबर 2023 को जब राज्यसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ और उससे एक दिन पहले लोकसभा ने भी इसे मंजूरी दी, तब यह केवल एक विधायी प्रक्रिया पूरी होने का क्षण नहीं था-यह भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की लंबे समय से चली आ रही आवाज़ को औपचारिक मान्यता मिलने का क्षण था।
एक महिला पत्रकार के रूप में इस ऐतिहासिक घटना को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि यह कानून आंकड़ों या सीटों का खेल भर नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक संरचना को चुनौती देता है, जिसमें वर्षों से निर्णय लेने की मेज पर महिलाओं की उपस्थिति सीमित रही है।
संसद की सीढ़ियों से समाज की चौखट तक: यह अधिनियम संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 के रूप में सामने आया, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण सुनिश्चित करता है। लेकिन इस कानून की सबसे बड़ी ताकत इसकी संवेदनशीलता है- यह सिर्फ सामान्य वर्ग ही नहीं, बल्कि SC/ST वर्ग की महिलाओं के लिए भी समान आरक्षण का प्रावधान करता है।
एक महिला पत्रकार के तौर पर मुझे यह तथ्य महत्वपूर्ण लगता है कि यह कानून केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने का नहीं, बल्कि समान अवसरों के विस्तार का प्रयास है। यह उन महिलाओं के लिए भी दरवाजे खोलता है, जिनकी आवाज़ अक्सर सामाजिक और आर्थिक सीमाओं के कारण दब जाती है।
27 साल का संघर्ष और एक नई सुबह: 1996 से लेकर 2023 तक, इस विधेयक ने कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे। हर बार उम्मीद जगी, हर बार निराशा भी मिली। लेकिन इस बार जब संसद के दोनों सदनों ने इसे पारित किया, तो यह सिर्फ राजनीतिक सहमति नहीं थी-यह समाज की बदलती मानसिकता का संकेत भी था।
इस पूरे सफर को कवर करते हुए कई महिला पत्रकारों ने इसे “प्रतिनिधित्व की लड़ाई” के रूप में देखा। आज यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह अधिनियम भारतीय महिलाओं की सामूहिक आवाज़ का परिणाम है।
उम्मीदें, लेकिन कुछ सवाल भी:हालांकि यह कानून ऐतिहासिक है, लेकिन इसके लागू होने की प्रक्रिया-जनगणना और परिसीमन के बाद ही प्रभावी होना-एक सवाल भी खड़ा करती है। एक महिला पत्रकार के रूप में यह सवाल उठाना जरूरी है कि क्या महिलाओं को उनके हिस्से का प्रतिनिधित्व पाने के लिए अभी और इंतजार करना होगा?
फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि यह कानून एक मजबूत शुरुआत है-एक ऐसी शुरुआत, जो आने वाले वर्षों में राजनीति की तस्वीर बदल सकती है।
लोकतंत्र में महिलाओं की नई भूमिका:आज भारत की महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं-चाहे वह विज्ञान हो, खेल हो या मीडिया। लेकिन राजनीति में उनकी भागीदारी अभी भी सीमित है। यह अधिनियम उस असंतुलन को दूर करने का प्रयास करता है।
मेरे लिए, एक महिला पत्रकार के रूप में, यह कानून सिर्फ खबर नहीं है-यह एक भावनात्मक पड़ाव है। यह उस विश्वास को मजबूत करता है कि जब महिलाएं निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगी, तो नीतियां अधिक समावेशी और संवेदनशील होंगी।
एक कदम, जो इतिहास लिखेगा:नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 केवल संसद में पारित एक कानून नहीं है, बल्कि यह उस परिवर्तन की शुरुआत है, जिसकी मांग वर्षों से की जा रही थी।
यह अधिनियम हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र तभी पूर्ण होता है, जब उसमें सभी की बराबर भागीदारी हो-और आज, भारतीय संसद ने उस दिशा में एक निर्णायक कदम बढ़ा दिया है।नारी शक्ति वंदन अधिनियम को धरातल पर उतारने और इसकी कार्यान्वयन बाधाओं को दूर करने के लिए संसद के बजट सत्र के दौरान 16 अप्रैल से 18 अप्रैल 2026 तक की एक विशेष बैठक बुलाई गई है।
मुख्य उद्देश्य (संशोधन विधेयक):
2029 का लक्ष्य: इस विशेष सत्र का मुख्य उद्देश्य अधिनियम में आवश्यक संशोधन करना है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि 2029 के लोकसभा चुनाव और आगामी विधानसभा चुनाव महिला आरक्षण (33%) के साथ ही आयोजित हों।
परिसीमन का पेंच: 2023 के अधिनियम में शर्त थी कि आरक्षण ‘अगली जनगणना और परिसीमन’ के बाद लागू होगा। अब सरकार इस प्रक्रिया को गति देने के लिए विधायी ढांचा तैयार कर रही है।
सीटों का नया गणित (प्रस्तावित):
ताजा चर्चाओं और रिपोर्टों के अनुसार, महिला आरक्षण लागू होने के बाद लोकसभा की संरचना में बड़ा बदलाव आ सकता है:
कुल सीटें: लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 816 तक हो सकती है।
महिला कोटा: इनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
16 अप्रैल को होने वाली बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में ‘डिजिटल जनगणना 2027’ का पहला चरण (House Listing) इसी महीने 1 अप्रैल 2026 से शुरू हो चुका है। यह जनगणना ही परिसीमन और महिला आरक्षण का आधार बनेगी।
एक नया अध्याय:
16 अप्रैल 2026 वह दिन हो सकता है, जब भारत “आरक्षण के वादे” से आगे बढ़कर “आरक्षण की वास्तविकता” की ओर कदम रखेगा।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक कानून नहीं, बल्कि उस परिवर्तन की शुरुआत है, जो देश की आधी आबादी को सत्ता के केंद्र में स्थान देने का संकल्प है।
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शक्ति वंदन अधिनियम 16 अप्रैल महिला आरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम…
"महिला आरक्षण सैद्धांतिक आरक्षण से हकीकत की ओर" सुनीता नगेले , चीफ एडिटर @mppost1 @Rajyasabhasectt@unwomenindia
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✍️ अंतिम शब्द
“यह अधिनियम केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि सत्ता में समान भागीदारी का अधिकार है।
16 अप्रैल 2026—शायद वह दिन हो, जब यह अधिकार हकीकत में बदलने की दिशा तय करेगा।” यह वह दिन होगा जब भारत ‘सैद्धांतिक आरक्षण’ से ‘व्यावहारिक कार्यान्वयन’ की ओर बढ़ेगा। यह सत्र तय करेगा कि भारतीय लोकतंत्र की अगली तस्वीर कितनी समावेशी होगी।“सिर्फ कानून नहीं, सदियों की प्रतीक्षा का उत्तर” 27 साल का संघर्ष और एक नई सुबह की सूर्य की भाँति नई किरणें लेकर सामने होगा।
( लेखक : वरिष्ठ पत्रकार और मध्यप्रदेश की पहली न्यूज़ पोर्टल एमपीपोस्ट की चीफ एडिटर हैं )