MP DAY-Utsavmai उत्‍सवमयी होगा 70वां मध्‍यप्रदेश स्‍थापना दिवस समारोह 1 से 3 नवम्‍बर, 2025 तक ‘‘अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश’’

Chief Minister -मुख्‍यमंत्री, मध्‍यप्रदेश शासन डॉ. मोहन यादव कार्यक्रम की अध्‍यक्षता करेंगे

उत्‍सवमयी होगा 70वां मध्‍यप्रदेश स्‍थापना दिवस समारोह ‘‘अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश’’, विकसित, समृद्ध और सशक्‍त मध्‍यप्रदेश की दिखेगी झलक, ‘‘उद्योग एवं रोजगार वर्ष’’ थीम
वैभवशाली अतीत के महानायक सम्राट विक्रमादित्‍य पर केन्द्रित महानाट्य, सांगीतिक रूप में श्रीकृष्‍ण की जीवन यात्रा, जुबिन नौटियाल, हंसराज रघुवंशी एवं स्‍नेहा शंकर के लाइव कॉन्‍सर्ट, विरासत से विकास ड्रोन शो एवं आतिशबाजी भी होगी
एक जिला-एक उत्‍पाद शिल्‍प मेला, व्‍यंजन मेला, पारंपरिक नृत्‍य, सांस्‍कृतिक यात्रा का होगा आयोजन 
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भोपाल। मध्यप्रदेश भारत का हृदय केवल भौगोलिक स्थितियों के कारण नहीं, बल्कि इसलिए भी है कि यह प्रदेश भारत की संस्कृति, परम्परा, अध्यात्म और विविधता को अपने में समेटे हुए है। विविधता से परिपूर्ण अपनी विरासत से आज मध्‍यप्रदेश विकास के पथ पर अग्रसर है। समृद्ध और सशक्‍त मध्‍यप्रदेश की यह झलक प्रदेशवासी राज्‍य के 70वें स्‍थापना दिवस समारोह ‘’अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश’’ में देख सकेंगे।
संचालक, संस्‍कृति श्री एन.पी. नामदेव ने बताया कि दिनांक 1 से 3 नवम्‍बर, 2025 तक आयोजित होने वाला यह प्रतिष्‍ठापूर्ण समारोह इस वर्ष नये कलेवर में प्रदेशवासियों के सामने होगा। तीन दिवसीय यह समारोह उत्‍सवमयी होगा। गीत, संगीत, नृत्‍य, कला, शिल्‍प कला, छायाचित्र, सांस्‍कृतिक यात्रा, ड्रोन शो, आतिशबाजी इत्‍यादि गतिविधियों के माध्‍यम से मध्‍यप्रदेश की विरासत और विकास के रंग देखने मिलेंगे। इस प्रदेशव्‍यापी आयोजन का मुख्‍य समारोह लाल परेड ग्राउण्‍ड, भोपाल में तीनों दिवस सायं 6:30 बजे से होगा।
पूर्वरंग अंतर्गत निकाली जायेगी सांस्‍कृतिक यात्रा
30 एवं 31 अक्‍टूबर, 2025 को स्‍थापना दिवस पूर्वरंग अंतर्गत शहर के विभिन्‍न चौराहों, मार्गों, बाजारों एवं प्रमुख स्‍थलों पर संस्‍कृति विभाग द्वारा सांस्‍कृतिक यात्रा निकाली जायेगी। इस यात्रा का उद्देश्‍य आम नागरिकों तक मध्‍यप्रदेश राज्‍य के स्‍थापना दिवस समारोह में सहभागिता और अपने प्रदेश के गौरवशाली अतीत और सशक्‍त वर्तमान एवं समृद्ध भविष्‍य के सम्‍बन्‍ध में जागरुकता होगा। साथ ही यह मध्‍यप्रदेश के विविधतापूर्ण संस्‍कृति और परम्‍पराओं को भी दिखाएगी। इसके अंतर्गत प्रदेश के सभी पांच लोक अंचलों यथा बुंदेलखण्‍ड, मालवा, निमाड़, बघेलखण्‍ड एवं चंबल सहित सभी सातों जनजातीय यथा गोण्‍ड, भील, बैगा, भारिया, सहरिया, कोरकू एवं कोल के पारंपरिक नृत्‍य प्रदर्शन के माध्‍यम से राज्‍य उत्‍सव में शामिल होने का आह्वान किया जायेगा। इसके साथ ही विविध सांस्‍कृतिक प्रस्‍तुतियां भी होंगी।
सांस्‍कृतिक यात्रा का रूट मैप
30 अक्‍टूबर, 2025 समय : दोपहर 2 से सायं 7 बजे तक
31 अक्‍टूबर, 2025
विशेष सांस्‍कृतिक यात्रा : महानाट्य विक्रमादित्‍य के पात्रों के साथ सम्‍मानीय क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की गरिमामयी उपस्थिति में माता मंदिर चौराहा से रोशनपुरा चौराहा तक, समय : सायं 4 बजे
युवाओं को जोड़ने महावि‍द्यालय एवं विश्‍वविद्यालय में आयोजन
70वां स्‍थापना दिवस समारोह अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश से युवाओं को जोड़ने विरासत से विकास विषय पर केन्द्रित प्रश्‍नोत्‍तरी एवं तात्‍कालिक भाषण प्रतियोगिताओं का आयोजन भोपाल के विभिन्‍न महाविद्यालय एवं विश्‍वविद्यालयों में किया जा रहा है। इसके अंतर्गत 29 अक्‍टूबर, 2025 को प्रात: 11 बजे उच्‍च शिक्षा उत्‍कृष्‍टता संस्‍थान, सरोजनी नायडू शासकीय कन्‍या महाविद्यालय, शासकीय रामानन्‍द संस्‍कृत महाविद्यालय, भोपाल में प्रश्‍न मंच का आयोजन होगा। 29 अक्‍टूबर, 2025 प्रात: 11 बजे से शासकीय गीतांजली कन्‍या महाविद्यालय, शासकीय श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी महाविद्यालय, राज्‍य स्‍तरीय विधि महाविद्यालय, भोपाल में भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। शासकीय मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय, शासकीय कला एवं वाणिज्‍य नवीन महाविद्यालय, बाबूलाल गौर शासकीय पीजी महाविद्यालय, भोपाल में निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। वहीं, प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्‍सीलेंस, शासकीय हमीदिया महाविद्यालय, महारानी लक्ष्‍मी बाई शासकीय महाविद्यालय एवं शासकीय महाविद्यालय, नरेला, भोपाल में पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। आईईएस यूनिवर्सिटी, भोपाल में गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं।
1 नवम्‍बर को आसमान में दिखेगा समृद्ध मध्‍यप्रदेश का दृश्‍य
तीन दिवसीय राज्‍य उत्‍सव ‘‘अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश’’ का शुभारंभ 1 नवम्‍बर, 2025 को सायं 6:30 बजे लाल परेड ग्राउंड, भोपाल में होगा। इस अवसर पर माननीय मंत्री, नागरिक उड्डयन, भारत सरकार श्री किंजरापु राममोहन नायडू एवं माननीय राज्‍यमंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) कानून एवं न्याय, भारत सरकार श्री अर्जुन राम मेघवाल मुख्‍य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता माननीय मुख्‍यमंत्री, मध्‍यप्रदेश शासन डॉ. मोहन यादव करेंगे। साथ ही मध्‍यप्रदेश शासन के माननीय मंत्रीगण, अतिथिगण एवं जनप्रतिनिधिगण भी उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम में सर्वप्रथम प्रदेश के 500 कलाकार भगवान श्रीकृष्‍ण की जीवन यात्रा को ‘’विश्‍ववंद’’ समवेत प्रस्‍तुति में सांगीतिक रूप में प्रस्‍तुत करेंगे। सांस्‍कृतिक प्रस्‍तुतियों के अलावा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के माध्यम से विरासत से विकास पर आधारित एक भव्‍य ड्रोन शो की प्रस्‍तुति भी दी जायेगी, जिसमें 2000 ड्रोन के माध्‍यम से अब तक का सबसे बड़ा विजुअल उत्‍सव होगा। आसमान में विकसित मध्‍यप्रदेश को नये और आकर्षक ढंग से प्रस्‍तुत किया जाएगा। इसके बाद सुप्रसिद्ध पार्श्‍वगायक श्री जुबिन नौटियाल एवं ग्रुप, मुम्‍बई के द्वारा गीत-संगीत की सुमधुर प्रस्‍तुतियां दी जाएंगी। जुबिन रातां लम्बियां, हमनवां मेरे, तारों के शहर में गीतों को गाने के लिए लोकप्रिय हैं। इसके अलावा भव्‍य आतिशबाजी का नजारा भी प्रदेशवासी देख सकेंगे। 1 नवम्‍बर, 2025 को सायंकालीन गतिविधि से पूर्व प्रात: 11 बजे से लाल परेड ग्राउंड, भोपाल में आयोजित विभिन्‍न प्रदर्शनियों का शुभारंभ माननीय मंत्री, नागरिक उड्डयन, भारत सरकार श्री किंजरापु राममोहन नायडू एवं माननीय राज्‍यमंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) कानून एवं न्याय, भारत सरकार श्री अर्जुन राम मेघवाल के मुख्‍य आतिथ्‍य में होगा। इस अवसर पर मध्‍यप्रदेश के माननीय मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी उपस्थि‍त रहेंगे।
विश्ववन्द – श्रीकृष्ण की सांगीतिक यात्रा : एक अभूतपूर्व संगीतमय महायज्ञ
“विश्ववन्द – श्रीकृष्ण की सांगीतिक यात्रा”- यह मात्र एक संगीतमय प्रस्तुति नहीं है, यह युगों-युगों से प्रवाहित हो रही भगवान श्रीकृष्ण की करुणा, स्नेह और आत्मज्ञान की अमर गाथा का एक अभूतपूर्व और विराट मंचन है। भारतीय सांस्कृतिक पटल पर पहली बार, यह आयोजन ऐसे भव्य और विशाल पैमाने पर आयोजित किया जा रहा है, जहाँ संगीत, नृत्य और आध्यात्मिकता की त्रिवेणी का संगम होगा। इस प्रस्तुति का केंद्रीय भाव श्रीकृष्ण का करुणाकर स्वरूप है – वह माधव जो गोकुल में बाल सखाओं के दुःख हरते हैं और कुरुक्षेत्र में अर्जुन को मोह से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। यह संपूर्ण कार्यक्रम श्रीकृष्ण के स्वयं द्वारा उच्चारित किए गए आत्म-वचनों पर आधारित है, जिसे जीवंत बनाने के लिए संगीत की तीन महान धाराओं – भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और विश्व संगीत – का एक भव्य और अनूठा समन्वय किया गया है। मंच पर 350 से अधिक प्रतिभाशाली गायक-गायिकाओं का विशाल कोरस (समवेत गान) होगा, जो एक साथ कृष्ण के लीला-छंदों और गीता के श्लोकों को अपनी आवाज देंगे। इस कोरस को सहयोग देने के लिए एक भव्य ऑर्केस्ट्रा होगा, जो ध्वनि की एक ऐसी अद्भुत और नई दुनिया रचेगा जो श्रोताओं को सीधे दिव्य लोक में ले जाएगी। इस भव्य आयोजन की संकल्पना श्रीमती वीनस तरकसवार द्वारा की गई है। संगीत संयोजन एवं निर्देशन श्री उमेश तरकसवार का है और नृत्य निर्देशन सुश्री श्वेता देवेंद्र, सुश्री क्षमा मालवीय और सुश्री कविता शाजी द्वारा किया गया है। संगीत की इस भव्यता को 150 से अधिक शास्त्रीय नर्तक-नर्तकियाँ अपनी भाव-भंगिमाओं से मूर्तरूप देंगी । इस नृत्य खंड में तीन प्रमुख भारतीय शास्त्रीय शैलियों – भरतनाट्यम (द्रविड़ियन ओज), कथक (उत्तरी भारत का नटखटपन और भाव) और मोहिनीअट्टम (केरल की लावण्यपूर्ण प्रस्तुति)  का संगम होगा। नर्तक माखन-लीला की शरारत से लेकर कालिया मर्दन के तांडव और रासलीला के माधुर्य तक, कृष्ण की संपूर्ण जीवन-यात्रा को अपनी पदतालों और मुद्राओं से जीवंत करेंगे।
दो दिन होगी महानाट्य सम्राट विक्रमादित्‍य की प्रस्‍तुति
समारोह के दूसरे दिन 2 नवम्‍बर, 2025 को दोपहर 12 बजे से सभी 10 प्रदर्शनियां, शिल्‍प मेला एवं व्‍यंजन मेला प्रदेशवासियों के लिए रात्रि 10 बजे से उपलब्‍ध होगा। सायंकालीन गतिविधियों के अंतर्गत सायं 6:30 बजे से महानाट्य सम्राट विक्रमादित्‍य की भव्‍य प्रस्‍तुति होगी। इस महानाट्य का निर्देशन श्री संजीव मालवीय द्वारा किया गया है और इसे श्रीविशाला सांस्‍कृतिक एवं लोकहित समिति, उज्‍जैन के कलाकार मंच पर प्रस्‍तुत करेंगे। महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य की भव्य प्रस्तुति के माध्यम से आम नागरिक यह भी जान सकेंगे कि मध्यप्रदेश का अतीत गौरवशाली रहा है, जिस अतीत में सम्राट विक्रमादित्य‍ जैसे महानायक हुए हैं। आज विकसित राज्य एवं राष्ट्र  की अवधारणा पर बात हो रही है, तो यह प्रेरणा हमें ऐसे ही अतीत के महानायकों से ही प्राप्त हुई है। जिनका राज्य जनकल्याण, सुशासन, विकास और शौर्य का प्रतीक रहा है। इस महानाट्य का मंचन 2 एवं 3 नवम्बर दो दिनों तक किया जाएगा, ताकि हमारे प्रदेश का वैभवशाली इतिहास अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके। इसके बाद सुगम संगीत की प्रस्‍तुति दी जायेगी। दूसरे दिन सुगम संगीत के लिए सु‍प्रसिद्ध गायक श्री हंसराज रघुवंशी एवं साथी, चंडीगढ़ उपस्थित रहेंगे, वे ‘’मेरा भोला है भंडारी’’, ‘’महादेवा’’, ‘’राधे राधे बोल मना’’ इत्‍यादि अनेक भजनों को गाने के लिए लोकप्रिय हैं।
तीसरे दिवस स्‍नेहा शंकर के सुरों से गूंजेगा राज्‍योत्‍सव
70वें स्‍थापना दिवस समारोह के तीसरे एवं अंतिम दिन 3 नवम्‍बर, 2025 को दोपहर 12 बजे से प्रदर्शनियां, शिल्‍प मेला एवं व्‍यंजन मेला रात्रि 10 बजे तक आयोजित किया जाएगा। सायंकालीन गतिविधि के अंर्तगत 6:30 बजे सर्वप्रथम सम्राट विक्रमादित्‍य महानाट्य की प्रस्‍तुति होगी। इसके बाद सु‍प्रसिद्ध गायिका सुश्री स्‍नेहा शंकर एवं साथी, मुम्‍बई की सुगम संगीत की प्रस्‍तुति होगी। स्‍नेहा शंकर चांद के टुकड़े, मेरा मेहबूब, हकूना मटाटा सहित अनेक गीतों को गाने के लिए लोकप्रिय हैं।
महानाट्य सम्राट विक्रमादित्‍य
जनकल्याण, सुशासन और शौर्य के पर्याय सम्राट विक्रमादित्य के जीवन और योगदान से नागरिकों को महानाट्य के माध्यम से परिचित करवाने महानाट्य सम्राट विक्रमादित्‍य का मंचन किया जा रहा है। राम और कृष्ण जैसे अवतार नायकों के बाद भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय नायक विक्रमादित्य ही हैं। भारत वर्ष के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध पुरातन पुरुषों में विक्रमादित्य अग्रणी है। उनकी वीरता, देश को पराधीनता से मुक्त करने की उत्कृष्ट अभिलाषा राजनीतिक उपलब्धियों सैनिक अभियान और विजय यात्राएँ शासन की आदर्श अनोखी विवेकपूर्ण न्यायपद्धति, कला एवं साहित्य की उन्नति में उदार सहयोग तथा सहभागिता जैसे उदात्त गुणों ने भारत ही नहीं आस-पास और सुदूर देशों में भी उन्हें सदा के लिये प्रतिष्ठित कर दिया। शकों तथा यवनों ने भारत पर आक्रमण कर आंतक मचा रखा था शक राजा महाबली, अर्थलोभी, पापी और दुष्ट थे, क्रूर हिंसक देश विरोधी शकों की उस दुर्दान्त, प्रलयंकारी काली छाया से विक्रमादित्य ने भारत को मुक्त कराया और 96 शक सामन्तों को पराजित कर उन्हें भारत से भागने पर विवश कर दिया था शकों को खदेड़ कर ही शकारि और साहसांक की उपाधियाँ धारण की। आज भी विकमादित्य द्वारा 2082 वर्ष पूर्व प्रारम्भ विक्रम संवत् भारत वर्ष ही नहीं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ काल गणना का आधार है। बेताल पच्चीसी और सिहांसन बत्तीसी में विक्रमादित्य के अद्भुत, विवेकपूर्ण न्याय, वीरता, शौर्य एवं महानता की कथाएँ सर्वविदित है। जिसके दरबार में नवरत्न कालिदास, वररुचि, वराहमिहिर, क्षपणक, घटखर्पर, अमर सिंह, बेताल भट्ट, शंकु, धन्वन्तरि जैसे प्रसिद्ध महापुरुष सदा जनकल्याणकारी कार्यों में ही लगे रहते रहते थे ऐसे महान सम्राट को जन-जन तक पहुँचाने हेतु महानाट्य के रूप में मंचित करने का चुनौतीपूर्ण और कठिन संकल्प उज्जैन की संस्था विशाला सांस्कृतिक एवं लोकहित समिति ने लिया। इस महानाट्य में विक्रमादित्य के जन्म से लेकर सम्राट बनने तक की सभी गाथाएँ अंकित की गई है। इतने विराट स्वरूप को प्रस्तुत करने के लिये कलाकारों का विशाल दल लगभग 150 कलाकारों और 50 अन्य सहयोगियों के माध्यम से इसे प्रस्तुत किया जायेगा। नाटक के दृश्यों का सजीव बनाने हेतु अश्व, रथ, पालकी एवं ऊँट आदि का उपयोग किया गया है। मंचीय प्रस्तुतिकरण को प्रभावी बनाने के लिये तीन मंचों एवं एलईडी ग्राफिक्स के स्पेशल इफेक्ट का प्रयोग किया गया है। प्रदेश की सीमा से बाहर अन्य प्रदेशों में भी महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य की प्रस्तुति को भरपूर प्रतिसाद मिला। उसी क्रम में इस महानाट्य की प्रस्तुति भोपाल के ऐतिहासिक लाल परेड ग्राउंड में होने जा रही है।
प्रदर्शनियां एवं नृत्‍य प्रस्‍तुतियों का आयोजन
संचालक, संस्‍कृति ने बताया कि अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश के अंतर्गत लाल परेड ग्राउण्‍ड में प्रतिदिन दोपहर 12 बजे से रात्रि 10 बजे तक विविध अनुषांगिक गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। इनमें विभिन्‍न प्रदर्शनियां प्रमुख आकर्षण होंगी, जिसमें विकसित मध्‍यप्रदेश 2047, मध्‍यप्रदेश के गौरव, विक्रमादित्‍य और अयोध्‍या, विक्रमादित्‍य की मुद्राएं और सिक्‍के, आर्ष भारत, भारत विक्रम, मध्‍यप्रदेश की बावडि़यां, मध्‍यप्रदेश की पारंपरिक कला, मध्‍यप्रदेश में विरासत से विकास, मध्‍यप्रदेश के मंदिर देवलोक सम्मिलित हैं। इसके साथ ही एक जिला-एक उत्‍पाद अंतर्गत ‘शिल्‍प मेला’ प्रदर्शन सह विक्रय एवं ‘स्‍वाद’ देशज व्‍यंजन मेला का आयोजन भी किया जा रहा है। इसके अलावा 2 एवं 3 नवम्‍बर, 2025 को दोपहर 3 बजे से मध्‍यप्रदेश के जनजातीय एवं लोक नृत्‍य प्रस्‍तुतियां भी संयोजित की जा रही हैं। इसके अंतर्गत करमा, परधौनी, भगोरिया, गुन्‍नूरसाही, घसियाबाजा, भड़म, बधाई, गणगौर, मोनिया एवं अहिराई सहित कई नृत्‍य प्रस्‍तुतियां होंगी।
शिल्‍प मेला में प्रदेश के पारंपरिक उत्‍पाद एवं व्‍यंजन मेला में अंचलों का स्‍वाद
मध्‍यप्रदेश राज्‍य अपनी कला शिल्‍प एवं संसाधनों के लिए देश ही नहीं दुनिया भर में प्रख्‍यात है। भारत सरकार की एक जिला एक उत्‍पाद योजना के अंतर्गत देश के सभी जिलों में संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने का कार्य किया गया है। मध्‍यप्रदेश के विभिन्‍न जिलों के उत्‍पादों को एक जगह पर लाने और प्रदेश की इस समृद्धि से आम नागरिकों को परिचित कराने एक जिला-एक उत्‍पाद अंतर्गत शिल्‍प मेला का आयोजन किया जा रहा है। इसमें बुरहानपुर के केले से बने उत्‍पाद, रायसेन का बासमती चावल, बालाघाट का चिनौर चावल, अशोकनगर की चंदेरी साड़ी और मुरैना की गजक जैसे अन्‍य कई उत्‍पादों को प्रदर्शन सह विक्रय के लिए उपलब्‍ध कराया जा रहा है। इसके साथ ही राज्‍योत्‍सव में मध्‍यप्रदेश के विभिन्‍न अंचलों का स्‍वाद चखने का अवसर भी प्रदेशवासियों को मिलेगा। इसके अंतर्गत बुंदेली, बघेली, मालवा, निमाड़, चम्‍बल अंचलों के पारंपरिक व्‍यंजन आम नागरिकों के लिए उपलब्‍ध रहेंगे। साथ ही प्रदेश की जनजा‍तियों के पारंपरिक व्‍यंजन भी चखने को मिलेंगे, इनमें भीली, बैगा, कोरकू, गोण्‍डी, मोटे अनाज से तैयार व्‍यंजनों का स्‍वाद आकर्षण रहेगा। यह व्‍यंजन संबंधित स्‍थान के लोगों द्वारा पारंपरिक तरीके से ही तैयार किए जाएंगे।
ये प्रदर्शनियां हो रहीं आयोजित
विक्रमादित्‍य कालीन मुद्रा-मुद्रांक
उज्जयिनी के लोकप्रिय, ऐतिहासिक शासक सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर एक नया संवत् ‘विक्रम संवत’ 57 ईस्वी पूर्व में प्रारंभ किया था। विक्रमादित्य जन-जन में लोकप्रिय रहे हैं। भारतीय राजाओं के आदर्श, धर्मप्रिय और लोक कल्याण में निरंतर प्रयत्नशील विक्रमादित्य का प्रचार प्रसार वृहत्तर भारत में बेताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी के साथ होता रहा। विक्रम संवत् वर्तमान में​ भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित है। भारतीय अस्मिता के प्रतीक गौरवशाली सम्राट विक्रमादित्य के काल प्रथम सदी ईस्वी पूर्व के समय की पुरातत्वीय सामग्री यथा सील (मुद्राएँ), मूर्तिलेख, शिलालेख, सिक्के एवं प्रचुर साहित्य उपलब्ध हैं। विक्रमादित्य केवल नाम ही नहीं एक उपाधि के रूप में भारतीय शासकों को गौरवान्वित करता रहा है। जन सामान्य तक विक्रमादित्यकालीन सामाजिक, पुरातत्वीय सामग्री छायाचित्रों के माध्यम से प्रदर्शित करने का यह प्रयास है। यह सामग्री अश्विनी शोध संस्थान महिदपुर में संरक्षित / संग्रहीत है।
भारत विक्रम : वृहत्तर भारत का सांस्कृतिक वैभव
भारत एक गौरवपूर्ण विश्व धरोहर का नाम है। विश्व के अतीत से भारत को निकाल दो तो यह सत्य है कि समस्त संसार के पास फिर कुछ भी नहीं रहेगा जिस पर उसे गर्व और गौरव हो सकता हो। वैदिक सृष्टि सम्वत् के अनुसार अभी तक सूर्य और पृथ्वी लगभग 1 अरब 97 करोड़ वर्ष की यात्रा तय कर चुके हैं। इतने लंबे यात्रा काल में विश्व में जो कुछ भी आज ऐसा दिखता है जिससे मानवता गौरवान्वित हो सकती हो तो वह केवल भारत की ही देन है। बात चाहे विश्व को राजनीतिक व्यवस्था देने की हो, न्याय व्यवस्था देने की हो, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के विकास की हो, फिर चाहे स्थापत्य कला, वास्तु कला के विकास की हो सभी में भारत ने ही कीर्तिमान गढ़े हैं। ऐसे कीर्तिमान जिनका विश्व में कोई सानी नहीं है, ​जो अनुपम और अद्वितीय हैं। भारत पर जब विदेशी आक्रांता आक्रमण कर रहे थे, उस समय भी भारत कुछ महत्वपूर्ण कर रहा था, वैदिक संस्कृति हो या सनातन ब्रम्हा, विष्णु या आदि शिव या रामायण, महाभारत विश्व के हर स्थान पर मंदिरों के रूप में उपस्थित है- विश्व में स्थित भारत के सांस्कृतिक वैभव के अवशेषों को छायाचित्रों के माध्यम से ढूंढने का प्रयास महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ,संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा किया है। कम्बोडिया, इंडोनेशिया, वियतनाम, थाईलैंड, लाओस, मलेशिया, नेपाल, पाकिस्तान, अजरबैजान, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, चीन, इजिप्ट, श्रीलंका, सऊदी अरब, जापान, अफगानिस्तान, पेरू, ईरान, आदि देशों में स्थित मंदिरों के छायाचित्रों को छायाकार प्रवीण कुमार पाटोद, भोपाल ने संजोया है।
आर्ष भारत : भारतीय ऋषि वैज्ञानिक परपरा पर केन्द्रित
विश्व की सबसे प्राचीन भारतीय सनातन परंपरा को जिन ऋषि, महर्षि, आचार्य व असंख्य मेधावान महापुरुषों ने अपनी साधना, तप, ध्यान व उससे अर्जित ज्ञान से पल्लवित किया वह अद्वितीय है। सनातन की यह शाश्वत परंपरा जिसका न कोई आदि है और न अन्त तथा इसमें शामिल ज्ञान की अविचल धारा ने उत्तरोत्तर संपूर्ण विश्व को नयी दिशाएँ प्रदान की हैं। इस प्रदर्शनी को महाराजा विक्रमादित्‍य शोधपीठ, संस्‍कृति विभाग, मध्‍यप्रदेश शासन तैयार किया गया है। जैसा कि विदित है ज्ञान को भारत में प्राचीन समय से ही सर्वाधिक महत्व प्रदान किया गया है, प्राचीन काल से लेकर आज के आधुनिक समय तक ऐसे असंख्य क्षेत्र हैं जिनमें इसी भारतीय ज्ञान परंपरा से कई नवीन प्रतिमान स्थापित हुए हैं।
भारत के विषय में लिखित साक्ष्य ऋग्वैदिक काल से मिलता है और ऋग्वेद इस संदर्भ में प्रथम ग्रंथ है। ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम पुस्तक है जो प्राचीन भारतीय आर्यों की राजनीतिक व्यवस्था के साथ ही उनके ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, धर्म, कला एवं साहित्यिक उपलब्धियों का एकमात्र महत्वपूर्ण स्रोत है। भौतिक जगत को समझने की चेष्टा सर्वप्रथम प्राचीन आर्यों ने ही आरंभ की थी। ऋग्वेद ग्रंथ के ‘विश्वकर्मा सूक्त’ में इस प्रकार के प्रश्न उठाये गये है कि ‘सृष्टि का अधिष्ठान क्या है? इसका आरंभ कैसे हुआ? किस पदार्थ से यह जगत् बना? इसका रचयिता कौन है?’ इन प्रश्नों में से कुछ का उत्तर तो अभी आधुनिक भौतिकी को भी देना बाकी है। इसी प्रकार ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में भी इस बात का संकेत किया गया है कि सृष्टि के आरंभ में गहन अथाह जल था और आधुनिक विज्ञान का भी इस विषय में यही मानना है। वैदिक काल के ऋषियों ने अनेक शास्त्रों, विज्ञानों एवं वेदांगों की नींव डाली थी। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अपने समय से बहुत आगे की कल्पनाओं और विचारों को साकार किया है। उन्होंने हजारों साल पहले ही प्रकृति से जुड़े कई रहस्य उजागर करने के साथ कई आविष्कार किये और युक्तियाँ बतायीं। उनके इसी विलक्षण ज्ञान के आगे आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक होता है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित वैज्ञानिक सूत्र बहुत ही सहज और सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किये गये हैं। उस काल में जहाँ जन सामान्य के जीवन को बेहतर बनाने के लिए शास्त्र लिखे गये तो विज्ञान और गणित के गूढ़तम रहस्यों के जवाब देने के लिए भी शास्त्र लिखे गये। आधुनिक भारतीय जनसमाज के मन मस्तिष्क में कहीं ना कहीं यह बात मौजूद है कि बहुतायत में वैज्ञानिक आविष्कार पश्चिमी देशों की देन है उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि पश्चिम के अधिकांश वैज्ञानिकों तथा आविष्कारकों ने भारतीय वैदिक विज्ञान की महत्ता को स्वीकार किया है। पश्चिम के राइट बंधुओं से हजारों वर्ष पूर्व महर्षि भरद्वाज ने विमान की कल्पना करते हुए वैमानिकी शास्त्र रचा जो आज के संदर्भों में भी सामयिक है। ‘पुष्पक’ तथा अन्य विमानों के रामायण में वर्णन कोई कोरी कल्पना नहीं है। ताजा वैज्ञानिक अनुसंधान ने भी तय किया है कि रामायण काल में विमान की प्रौद्योगिकी इतनी विकसित थी जिसे आज समझ पाना भी कठिन है। मय विश्वकर्मा ने ब्रह्मा से वैमानिकी विद्या सीखी और पुष्पक विमान बनाया। पुष्पक विमान की पद्धति का विस्तृत ब्यौरा महर्षि भारद्वाज लिखित पुस्तक यंत्र सर्वस्व में भी किया गया है। इस पुस्तक के 40 अध्याय में से एक अध्याय वैमानिकी शास्त्र अभी भी उपलब्ध है। इसमें 25 तरह के विमानों का विवरण है। इस पुस्तक में वर्णित कुछ शब्द जैसे विश्व क्रिया दर्पण आज के रडार जैसे यंत्रों की कार्यप्रणाली का रूपक है।
आधुनिक विज्ञान में जॉन डाल्टन के परमाणुवाद का योगदान माना जाता है। परंतु भारत के महर्षि कणाद ने डाल्टन से दो हज़ार वर्ष पूर्व ही परमाणुवाद प्रतिष्ठित कर चुके थे। भागवत पुराण में भी परमाणु की सही-सही परिभाषा दी गयी है। पुराणों में जल में अग्नि का वास होने का उल्लेख है। इससे जल से ऊर्जा प्राप्त होने ही का आशय नहीं बल्कि वरुण (जल) के यौगिक होने का भी संदेश मिलता है। आधुनिक भाषा में जल को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यौगिक माना जाता है। पुराण की भाषा में जल पृथ्वी तत्व हाइड्रोजन और अग्नि तत्व ऑक्सीजन का यौगिक है। न्यूटन से कई सदियों पहले भारत के खगोल विज्ञानी भास्कराचार्य ने यह प्रतिपादित कर दिया था कि पृथ्वी आकाशी पदार्थों को एक विशेष शक्ति से अपनी तरफ आकर्षित करती है। उन्होंने ही गणितीय गणना में शून्य को प्रतिपादित किया था। पश्चिमी खगोल विज्ञानी कॉपरनिकस से हजार वर्ष पूर्व भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने पृथ्वी की आकृति व इसकी अपनी धुरी पर घूमने की पुष्टि कर दी थी। वैदिक युग में सुश्रुत जैसे ऋषि चिकित्सक सफल शल्य चिकित्सा करते थे और आधुनिक विज्ञान ने इसको कुछ सदी पहले ही पुनः आविष्कृत किया। गणित विज्ञान, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, ऊर्जा एवं पृथ्वी के जीवन सम्बन्धी ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिससे सिद्ध होता है कि सनातन वैदिक ज्ञान कितना विकसित था, जिसके मूल का उपयोग कर आज के आधुनिक विज्ञान के नाम पर पश्चिमी देशों द्वारा वैश्विक स्तर पर फैलाया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था। प्राचीन भारत में विज्ञान सहित अनेक विषयों पर अनेक शोध हुए हमारे शास्त्रों के उल्लेख से स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारतीय ऋषि-मुनि महान वैज्ञानिक व शोधकर्ता थे। वेद, उपनिषद, भागवत, गीता आदि ग्रंथों के अनेक सूत्र से आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोग प्रेरित होते रहे हैं। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को निष्पक्ष ढंग से देखने पर यह ज्ञात होता कि भारत विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में अति उन्नत था। विज्ञान का विकास भारत में वैदिक काल से ही प्रारंभ हो जाता है। वेदों में गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद व कृषि सहित अनेक विज्ञानों के विकसित होने के प्रमाण उपलब्ध हैं। वैदिक सभ्यता यज्ञ प्रधान रही है। विभिन्न उद्देश्यों से लौकिक एवं पारलौकिक अभ्युत्थान हेतु अनेक प्रकार के यज्ञ नियमित रूप से होते रहते थे।
इसके विशिष्ट प्रकार की ज्यामितीय आकार की वेदिकाएँ बनती थीं। यज्ञों के लिए मुहूर्त निश्चित होते थे। यज्ञों की सुव्यवस्था एवं सफल संपादन के लिए गणित, ज्यामिति और ज्योतिष तथा खगोल विज्ञान विकसित हुए। गणित विशेषतः उसकी दार्शनिक अंक प्रणाली और शून्य का आविष्कार विश्व को भारत की सबसे महत्वपूर्ण देन स्वीकार की जाती है। वास्तव में वैदिक युग को ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं को विकसित करने का श्रेय है। वैदिक ऋषि होने अपने तपोवन में विज्ञान के विविध रूपों का अनुसंधान किया था। उन्होंने प्रकृति पदार्थ के रहस्यों को वैज्ञानिक ढंग से प्रकट किया। वैज्ञानिक अनुसंधान ही उनकी रीत-नीति आधुनिक विज्ञान की संकीर्ण सीमाओं में ना बंधते हुए भी उच्चस्तरीय, आकर्षक व सम्मोहक है। वैदिक ऋषियों के विज्ञान की विविध धाराएँ आयुर्वेद भौतिक गणित रसायन वनस्पति जीव व भूगर्भ विज्ञान तथा कृषि व शिल्प आदि के रूप में प्रकट हुई है।
भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा में विक्रम संवत् पंचांग रचना का दिन माना जाता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना कर पंचांग की रचना की थी। विक्रम संवत् संपूर्ण धरा की प्रकृति, खगोल सिद्धांतों और ग्रह-नक्षत्रों से जुड़ा है। इसका उल्लेख हमारे ग्रन्थों में भी है। इसके कई वैज्ञानिक आधार और पूरे विश्व के मानने हेतु तर्क भी हैं। सम्राट विक्रमादित्य के काल में ज्ञान की यही परंपरा उत्तरोत्तर अग्रसर होती रही।
आज से 3000 वर्ष पूर्व भारतीय संस्कृति का जो रूप था आज भी वह मूलतः वैसा ही है। दुनिया में अनेक सभ्यताओं ने जन्म लिया किंतु काल ने उन्हें ध्वस्त कर दिया। केवल भारत ही एक ऐसा देश है जिसका अतीत कभी मरा नहीं। वह बराबर वर्तमान के रथ पर चढ़कर भविष्य की तरफ अग्रसर रहा। भारत का अतीत कल भी जीवित था वह आज भी जीवित है और आगे भी रहेगा। विक्रमकालीन ग्रंथों के अध्ययन से हम उस समय के हिंदू मस्तिष्क का अनुमान लगा सकते हैं जिसने हिंदू धर्म को नव जीवन प्रदान किया। एक से बढ़कर एक विद्वान हुए जिन्होंने ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में खोज करके जिस साहित्य की सृष्टि की वह आज भी प्रशंसनीय है तथा आज के विद्वान भी उससे सहायता प्राप्त करते हैं। विक्रमादित्य के काल में ज्ञान, विज्ञान, कला एवं साहित्य में जो पथ प्रशस्त हुआ वह अभूतपूर्व था।
सम्राट विक्रमादित्य और अयोध्या
वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, “अष्टचक्रा नवदद्वारा देवानां पूरयोध्या” और इसकी सम्पन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। अथर्ववेद में यौगिक प्रतीक के रूप में अयोध्या का उल्लेख हैः-
अष्टचक्का नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तथ तस्यां हिरण्मया कोशा स्वर्गी ज्योतिषावृतः ॥
(अथर्ववेद 10.2.31)
स्कन्दपुराण के अनुसार सरयू के तट पर दिव्य शोभा से युक्त दूसरी अमरावती के समान अयोध्या नगरी है। मानव सभ्यता की पहली पूरी होने का पौराणिक गौस्व अयोध्या को स्वाभाविक रूप से प्राप्त है। यह उस तेजधारी राजवंश का निवास स्थान था जो सूर्यदेव से उत्पन्न हुआ और जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र का अवतार हुआ। अयोध्या को भगवान श्रीराम के पूर्वज विवस्वान (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु ने बसाया था, तभी से इस नगरी पर सूर्यवंशी राजाओं का राज महाभारत काल तक रहा। यहाँ पर प्रभु श्रीराम का दशरथ के महल में जन्म हुआ था। महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण में जन्मभूमि की शोभा एवं महत्ता की तुलना दूसरे इन्द्रलोक से की है। धन-धान्य व रत्नों से भरी हुई अयोध्या नगरी की अतुलनीय छटा एवं गगनचुंबी इमारतों के अयोध्या नगरी में होने का वर्णन भी वाल्मीकि रामायण में मिलता है। इतिहासकारों के अनुसार कौशल प्रदेश की प्राचीन राजधानी अवध को कालांतर में अयोध्या और बौद्धकाल में साकेत कहा जाने लगा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर था। हालाँकि यहाँ आज भी हिन्दू, बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़े मंदिरों के अनेक अवशेष देखें जा सकते हैं। उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य भारतवर्ष के अतीत के सर्वाधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय पुरुष हैं।
भारतवर्ष के महाकाव्यों में रामायण और महाभारत के महान् नायकों- श्रीराम और श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई भी दूसरा व्यक्ति विक्रमादित्य के समान जन साधारण में समाहत और स्मृत नहीं है। विदेशी आक्रमण के विरोध में उनके द्वारा देश की स्वाधीनता की रक्षा, उनकी सैनिक एवं राजनीतिक उपलब्धियों, उनका आदर्श शासन, उनका अनुपम न्याय, विवेक तथा साहित्य एवं कला के प्रश्श्रय में उनकी उदार हृदयता ने उनके नाम को अमर बनाकर देश के जनमानस में प्रतिष्ठित कर दिया है। उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने लगभग सम्पूर्ण एशिया को जीत लिया था। उस समय उनका साम्राज्य आधुनिक चीन, मध्य एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया के कुछ भाग तक फैला हुआ था जो कि अभी तक के इतिहास का सबसे बड़ा साम्राज्य है। सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित किया था। उनके पराक्रम को देखकर ही उन्हें महान् सम्राट कहा गया और उनके नाम की उपाधि कुल चौदह भारतीय राजाओं को दी गई। विक्रमादित्य की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की। भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य भारत के गौरव, उत्कर्ष, धर्म, त्याग, वैभव और ज्ञान के प्रतीक है।
प्रबन्धकोश के अनुसार अपने राज्य को राम राज्य बनाने की अभिलाषा में सम्राट विक्रमादित्य ने अपने राज्य में स्थान-स्थान पर अनेक मंदिर बनवाए थे और राम के चरण पादुका के अन्वेषण में उन्होंने अयोध्या में उत्खनन करवाया था। उजाड़ अयोध्या का पता लगाना कठिन था और जब विक्रमादित्य ने इसका जीर्णोद्धार करना चाहा तो उसकी सीमा निश्चित करना दुष्कर हो गया। लोग इतना ही जानते थे कि यह नगर कहीं सरयू तट पर बसा हुआ था और उसका स्थान निश्श्य करने में सम्राट विक्रमादित्य का मुख्य सूचक नागेश्वरनाथ का मन्दिर था जिसका उल्लेख प्राचीन पुस्तकों में मिलता है। सम्राट विक्रमादित्य के साथ कई पौराणिक कथाएँ भी जोड़ दी गयी है, किन्तु यहाँ इतना ही उल्लेखित करना पर्याप्त है कि सम्राट विक्रमादित्य के द्वारा ही यहाँ एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। ईसा से लगभग एक सदी पहले का यह प्रसंग है। कहते है कि भगवान श्रीराम के जल समाधि लेने के पश्चात अयोध्या कुछ काल के लिए उजाड़ हो गई थी, लेकिन उनकी जन्मभूमि पर बना महल वैसे का वैसा ही था। भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने एक बार पुनः राजधानी अयोध्या का पुनर्निर्माण कराया। इस निर्माण के बाद सूर्यवंश की अगली चौवालिस पीढ़ियों तक इसका अस्तित्व आखिरी राजा, महाराजा बृहदद्दल तक अपने चरम पर रहा। कौशलराज बृहदद्दल की मृत्यु महाभारत युद्ध में अभिमन्यु के हाथ हुई थी। महाभारत युद्ध के बाद अयोध्या उजड़-सी गयी, मगर श्रीराम जन्मभूमि का अस्तित्व फिर भी बना रहा। सम्राट विक्रमादित्य के बाद के राजाओं ने समय-समय पर इस मंदिर की देख-रेख की। उन्हीं में से एक शुंग वंश के प्रथम शासक पुष्यमित्र शुंग ने भी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। पुप्यमित्र का एक शिलालेख अयोध्या से प्राप्त हुआ था जिसमें उसे सेनापति कहा गया है तथा उनके द्वारा दो अश्वमेध यज्ञों के किये जाने का वर्णन भी मिलता है। अनेक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि गुप्तवंशीय सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय और तत्पक्षात काफी समय तक अयोध्या गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी। गुप्तकालीन महाकवि कालिदास ने अयोध्या का रघुवंश में कई बार उल्लेख किया है। बाबर के सेनापति मीर बांकी ने 1528 में जिस मंदिर को ध्वस्त किया था और जिस पर अब भव्य राम मंदिर का पुनर्निर्माण हो चुका है। उसका निर्माण सम्राट विक्रमादित्य ने ही करवाया था। साथ ही अयोध्या में 240 नए मंदिरों का तथा 60 प्राचीन मंदिरों के निर्माण का श्रेय भी सम्राट विक्रमादित्य को ही जाता है। दरअसल, यह कोई कपोल कल्पित बात नहीं है। बल्कि सर्वोच्च न्यायालय में दी गयी तथ्यात्मक दलील का भाग है जिसे न्यायालय द्वारा मान्यता दी गयी है। इसका विस्तार से उल्लेख गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक अयोध्या दर्शन में भी मिलता है। यह मंदिर काल के कई रूपों को बर्दाश्त करता हुआ अपने स्थान पर अडिग और अचल खड़ा है। सम्राट विक्रमादित्य ने जब अयोध्या की पुना खोज की तो सबसे पहले इसी स्थान का पता लगा। अयोध्या का प्राचीन इतिहास बताता है कि वर्तमान अयोध्या सम्राट विक्रमादित्य द्वारा ही बसायी है। सम्राट विक्रमादित्य देशाटन करते हुए संयोगवश सरयू किनारे पहुँचे थे और यहाँ उनकी सेना ने शिविर डाला था। उस समय यहाँ वन था। यहाँ कोई प्राचीन तीर्थ-चिह्न नहीं थे। सम्राट विक्रमादित्य को इस भूमि में कुछ चमत्कार दीख पड़ा। उन्होंने खोज प्रारम्भ की और पास के योग सिद्ध संतों की कृपा से उन्हें ज्ञात हुआ कि यह श्री अवध की भूमि है। उन संतों के निर्देश से सम्राट ने यहाँ भगवतलीला स्थली को जानकर मन्दिर, सरोवर, कूप आदि का निर्माण करवाया। मथुरा के समान अयोध्या भी आक्रमणकारियों का बार-बार आखेट होती रही है। बार-बार आततायियों ने इस पावन पुरी को ध्वस्त किया। इस प्रकार अब अयोध्या में प्राचीनता के नाम पर केवल भूमि और सरयूजी ही बची रही। अवश्य ही भगवतलीला स्थली के स्थान यही है। इस महान पावन पुरी को पुनर्निमित कर भगवान श्रीराम के प्रति सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी श्रद्धा और आस्था को प्रकट किया। उज्जयिनी के महाकाल से अयोध्या तक विक्रमादित्य ने भारतीय सनातनता और भागवत धर्म को प्रतिष्ठित किया है।
मध्‍यप्रदेश की पारंपरिक कलाएं
मध्‍यप्रदेश राज्‍य के विभिन्‍न अंचलों एवं जनजातीय बहुल क्षेत्रों की पारंपरिक कलाएं वर्तमान समय में देश ही नहीं दुनिया भर में प्रख्‍यात हो रही हैं। लोक एवं जनजातीय क्षेत्रों में पूर्वजों द्वारा सुनाई गईं कथाएं, परम्‍परायें, संस्‍कृतियां, रीति-रिवाज, तीज-त्‍योहार एवं प्रमुख अवसरों को पारंपरिक कलाओं में संजोने की चलन रहा है। इन कलाओं को संस्‍कृति विभाग द्वारा कैनवास पर संरक्षित करने का सफल कार्य किया जा रहा है। ताकि भविष्‍य में इन्‍हें अपनी संस्‍कृति एवं परंपराओं को समझने और जानने के लिए नई पीढि़यों तक पहुंचाया जा सके। इन्‍हीं कलाओं की प्रदर्शनी मध्‍यप्रदेश स्‍थापना दिवस समारोह अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश के अंतर्गत प्रदर्शित किया जा रहा है। जिसमें बुंदेलखण्‍ड, बघेलखण्‍ड, निमाड़, मालवा अंचलों की लोक कलाएं और गोण्‍ड, भील इत्‍यादि जनजातियों की जनजातीय कलाओं को सम्मिलित किया गया है।
मध्‍यप्रदेश की बावडि़यां
70वें मध्‍यप्रदेश स्‍थापना दिवस समारोह ‘’अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश’’ के अंतर्गत संचालनालय पुरातत्‍व, अभिलेखागार और संग्रहालय के संयोजन में ‘’मध्‍यप्रदेश की बावडि़यां’’ केन्द्रित प्रदर्शनी भी आयोजित की जा रही है। मध्‍यप्रदेश में प्राचीन काल में जल संवर्धन हेतु बावडि़यों का निर्माण किया गया था। इन्‍हें पुर्नजीवित कर इनका संरक्षण किया जा रहा है। इनमें गोल बावड़ी – चंदेरी, चकले की खिड़की – चंदेरी, काजी बावड़ी – चंदेरी, पांडे बावड़ी, चांदई बावड़ी – फतेहाबाद, झलारी बावड़ी – चंदेरी, कुंजा देवी बावड़ी – दतिया, चम्‍पावती का किला चाचौड़ा – गुना, बावड़ी बजरंग किला – गुना, जौहर कुण्‍ड – ग्‍वालियर – दुर्ग, बावड़ी किला पिछोर – ग्‍वालियर, गोंड राजा का महल और बावड़ी – सिमरिया, बावड़ी गढ़कुण्‍डार दुर्ग, निवाड़ी, प्राचीन बावड़ी समसगढ़ – भोपाल, बालाघाट हट्टा, गचाऊ बावड़ी – चंदेरी, देवरा किला – छतरपुर, बावड़ी गोहद – भिण्‍ड सहित अन्‍य बावडि़यों की जानकारी सहित छायाचित्र प्रदर्शनी का संयोजन किया जा रहा है।
जिलों में होंगी प्रदर्शनी, प्रतियोगिताएं एवं संवाद-गोष्ठियां
अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश का आयोजन प्रदेशस्‍तरीय होगा। प्रदेश के समस्‍त जिलों में विभिन्‍न गतिविधियों का आयोजन होगा। इन गति‍विधियों में चित्र/छायाचित्र/शिल्‍प प्रदर्शनियां, सामान्‍य ज्ञान प्रतियोगिता, वाद-विवाद/निबंध प्रतियोगिता, संवाद, गोष्‍ठी, युवा वैज्ञानिक सम्‍मेलन, सांस्‍कृतिक गतिविधियां, गौरव चरित्रों पर एकाग्र प्रदर्शनी, जिला उत्‍पादों का प्रदर्शन एवं उत्‍कृष्‍ट कार्यों से संबंधित प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी। आयोजन से युवाओं को जोड़ने के लिए प्रदेश की गौरवशाली विरासत, बहुआयामी संस्कृति, पर्यटन, उद्योग, विज्ञान के क्षेत्र से संबंधित सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता, वाद-विवाद, निबंध प्रतियोगिता, प्रदेश के विकास, पर्यटन और सांस्कृतिक महत्व के स्थलों पर आधारित फोटो प्रदर्शनी, पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन स्कूलों और कालेजों में किया जाएगा। सेवा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाएं, विज्ञान, उद्योग, व्यवसाय के क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करने वाली संस्थाएं, व्यक्ति पर केंद्रित गतिविधियां जैसे संवाद, गोष्ठी, युवा वैज्ञानिक सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा।
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